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रुहेलखंड के क्षत्रिय कुर्मियों का गौरवशाली इतिहास

रुहेलखंड की भूमि पर कुर्मियों के अस्तित्व की शुरुआत होती है , एक बदले की भावना से ,1781 का बदला , जी हां पानीपत के तृतीय युद्ध के दौरान जब मराठो को भारी क्षति का सामना करना पड़ा था। एक ओर सारे मुस्लिम शासक इस्लाम के नाम पर एक हो गए थे वही दूसरी ओर मराठो का साथ देने का लिए कोई सामने नही आया, पानीपत का जलवायु भी मराठो के विरुद्ध था पर इसका यह मतलब बिल्कुल भी नही था कि मराठे हार मान जाये, खैर मराठे पानीपत कैसे हारे यह एक अलग चर्चा का विषय है, पर आक्रमणकारियो यह मानकर बैठ गए कि मराठे इतनी बड़ी क्षति झेल नही पाएंगे और मराठा शक्ति का पतन हो जाएगा पर उनकी यह सोच ग़लत साबित हुई और सन 1772 में महाजदजी सिंदिया के नेतृत्व में मराठो ने रुहेलखंड पर आक्रमण कर दिया, रुहेल रुहेलखंड के शासक थे तथा रुहेलखंड की स्थानीय शक्ति भी , भीषण रक्तपात घनघोर युद्ध के बाद अंत मे मराठो ने रुहेलों ही हरा दिया और पुनः सबको दिखा की मराठो ने अभी हर नही मानी है।
उसी वर्ष 1772 में महाजदजी ने राजनीतिक तथा कूटनीति के लिए मराठो को यहाँ बसाना सुरु किया।
तब से लेकर आज तक रुहेलखंड की धरती पर कुर्मियों का ही औपचारिक या अनोपचारिक शासन रहा है।
वर्तमान में कुर्मी समाज की जनसंख्या
बरेली - 6,70,000
पीलीभीत - 7,21,000
शाहजहांपुर - 2,90,000
रामपुर - 2,18,000
रुहेलखंड में कुर्मियों की न सिर्फ आबादी है बल्कि वह सामाजिक तथा आर्थिक रूप से भी ससक्त है।
रुहेलखंड से प्रमुख कुर्मी व्यक्तित्व
मौजूदा समय मे भारत सरकार में केंद्रीय मंत्री तथा बरेली से लगातार 8 बार के सांसद संतोष गंगवार भी कुर्मी समाज से ही है ।
कुंवर मोहनस्वरूप यदुवंशी जो कि पीलीभीत के पूर्व सन्सद है।
कुंवर  ढाकनलाल राय बहादुर जो कि एक स्वतंत्रा-सैनानी है तथा मंत्री भी रह चुके है।
महेंद्र सिंह यदुवंशी जो कि असहयोग आंदोलन के सदस्य थे तथा कांग्रेस अध्य्क्ष भी राह चुके है।
रुहेलखंड के कुर्मियों का गौरवशाली इतिहास रहा है और सम्पूर्ण विश्व को इससे चेतना लेनी की ज़रूरत है क्योंकि
हार के जितने वाले
को कुर्मी कहते है।


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Comments

  1. रुहेलखण्ड में मराठो का आगमन 1750 में ही हो गया था पर यहां बसे नही थे ।
    पूरे उत्तर भारत के अभियानों में जहां तहां ठहरना पड़ा , 1770 में पानीपत के तृतीय युद्ध का बदला लेने के लिये यह सेना एक वार फिर उठी खड़ी हुई थी ।
    डींग राजस्थान में राजपूत और जाटो को हराते हुये मराठो ने
    इटावा में अपना पड़ाव डाला पूर्व से आये हुये सैनिको को यही बसाकर वह नजीववाद की तरफ बड़े,1770 में ही महादजी सिंधिया के नेतृत्व में इस सेना पानीपत के गद्दार नजीव खा की कब्र को बारूद से उड़ाया और महल को लूट लिया ।
    नजीववाद से होते हुये यह सेना रुहेलों,अफगानों को रौंदती हुई बदायूँ पहुंची ।
    बदायूँ में ही 1772 में रुहेलों और मराठो में युद्ध हुआ ।
    जिसमे रुहेलों की हार हुई और उनपर बड़ा जुर्माना लगाया गया ।
    सेना यही से 1803 में अंग्रेजी कमांडर लेक के खिलाफ फरूखाबाद में लड़ने गयी ।

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